नई दिल्ली/कुआलालंपुर: जब भी किसी जानलेवा वायरस का जिक्र होता है, हमारी जुबान पर सबसे पहले कोविड-19 या इबोला का नाम आता है। लेकिन वैज्ञानिकों और वायरोलॉजिस्ट्स की डायरी में एक नाम ऐसा है जो शायद कोरोना से कम शोर मचाता है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा खतरनाक है। वह नाम है— निपाह वायरस (NiV)।
यह वायरस हवा में कोरोना की तरह नहीं उड़ता, लेकिन इसकी चपेट में आने वालों के बचने की उम्मीद बहुत कम होती है। आंकड़े गवाह हैं कि निपाह के मामलों में मृत्यु दर 40% से 75% तक रही है। यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे दुनिया के उन चुनिंदा वायरसों की सूची में रखा है, जो भविष्य में बड़ी महामारी की वजह बन सकते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि यह वायरस आखिर आया कहां से? जंगल के अंधेरे में छिपा यह दुश्मन इंसानी बस्तियों तक कैसे पहुंचा? और क्यों तमाम कोशिशों के बावजूद यह हर कुछ सालों में लौट आता है?
1998: एक गांव, सुअर और एक रहस्यमयी बीमारी
निपाह की कहानी किसी हाई-टेक लैब में नहीं, बल्कि मलेशिया के एक साधारण से गांव ‘कंपुंग सुंगई निपाह’ (Kampung Sungai Nipah) के सुअर फार्मों से शुरू हुई।
सितंबर 1998 का वक्त था। इस गांव के सुअर पालकों में अचानक एक अजीब बीमारी फैलने लगी। शुरुआत तेज बुखार और सिरदर्द से हुई, लेकिन जल्द ही मरीजों के दिमाग में सूजन (Encephalitis) आने लगी। लोग कोमा में जाने लगे।
शुरुआत में डॉक्टरों को लगा कि यह ‘जापानी इंसेफेलाइटिस’ (JE) है, जो मच्छरों से फैलता है। प्रशासन ने पूरे इलाके में धुआं (Fogging) करवाया, मच्छरों को मारने के लिए अभियान चलाया। लेकिन एक अजीब बात थी—मच्छर मर रहे थे, पर इंसानों का मरना नहीं रुक रहा था।
तभी डॉ. चुआ काव बिंग (यूनिवर्सिटी ऑफ मलाया) ने लीक से हटकर सोचने की हिम्मत दिखाई। उन्होंने एक मरीज के ब्रेन टिश्यू की जांच की और पाया कि यह JE नहीं, बल्कि एक बिल्कुल नया वायरस है। मार्च 1999 में अमेरिका की CDC ने मुहर लगा दी—दुनिया को एक नया दुश्मन मिल चुका था, जिसे नाम दिया गया ‘निपाह’।
इस प्रकोप को रोकने के लिए मलेशियाई सरकार को दिल दहला देने वाला फैसला लेना पड़ा—वहां 10 लाख से ज्यादा सुअरों को मार दिया गया। इसने वहां के पोर्क उद्योग की कमर तोड़ दी, लेकिन इंसानों को बचाने का यही एकमात्र रास्ता था।
असली गुनहगार कौन? प्रकृति का इशारा
जब वैज्ञानिकों ने इस वायरस की जड़ तलाशी, तो सुई जाकर अटकी ‘फ्रूट बैट्स’ (Fruit Bats) यानी बड़े फलों वाले चमगादड़ों पर। जिन्हें हम ‘फ्लाइंग फॉक्स’ भी कहते हैं।
मलेशिया में यह ऐसे फैला था: जंगलों की कटाई ने चमगादड़ों को इंसानी बस्तियों के पास आने पर मजबूर कर दिया। ये चमगादड़ फार्म के पास लगे पेड़ों के फल खाते थे। उनके आधे खाए फल या लार सुअरों के बाड़े में गिरते। सुअरों ने वो फल खाए, वायरस उनके शरीर में कई गुना बढ़ा और वहां से उन किसानों तक पहुंचा जो सुअरों की देखभाल करते थे।
यह प्रकृति का एक संकेत था—जब हम उसके दायरे में घुसपैठ करेंगे, तो परिणाम खतरनाक होंगे।
भारत और बांग्लादेश: यहां कहानी बदल गई
अगर यह वायरस सिर्फ सुअरों तक सीमित रहता, तो शायद कहानी अलग होती। लेकिन 2001 में जब यह वायरस भारत (सिलीगुड़ी) और बांग्लादेश पहुंचा, तो इसने अपना तरीका बदल लिया।
यहाँ ‘सुअरों’ की जरूरत नहीं पड़ी। बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में सर्दियों में कच्चा खजूर का रस (Date Palm Sap) पीने का चलन है। रात को पेड़ों पर मटके बांधे जाते हैं। मीठे रस के लालच में चमगादड़ वहां आते हैं और मटकों में अपनी लार या मल छोड़ जाते हैं। जब लोगों ने वह कच्चा रस पिया, तो वे सीधे संक्रमित हो गए।
सबसे डरावनी बात यह थी कि सिलीगुड़ी और बाद में केरल के प्रकोप ने साबित कर दिया कि यह वायरस इंसान से इंसान में फैल सकता है। अस्पताल में मरीज की देखभाल करने वाले रिश्तेदार और नर्सें इसकी चपेट में आने लगे।
अब तक का सफर: एक नजर में
1998 के बाद से यह वायरस लुका-छिपी का खेल खेल रहा है:
- 1998-99: मलेशिया और सिंगापुर में 276 लोग बीमार हुए, 100 से ज्यादा की मौत हुई।
- 2001 (सिलीगुड़ी, भारत): इसने भारत में दस्तक दी। 66 मामले आए और 45 लोगों की जान गई। अस्पतालों के अंदर संक्रमण फैलना सबसे बड़ी चिंता थी।
- 2018 (केरल): कोझिकोड में आया प्रकोप पूरी दुनिया के लिए एक केस स्टडी बना। 18 मरीज मिले, जिनमें से 17 की मौत हो गई। लेकिन केरल सरकार की मुस्तैदी और ‘कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग’ ने इसे महामारी बनने से रोक लिया।
- बांग्लादेश: यहां तो यह लगभग हर साल सर्दियों में दस्तक देता है, जब खजूर के रस का सीजन आता है।
खतरा आज भी बरकरार क्यों?
निपाह वायरस का आज भी कोई पक्का इलाज या वैक्सीन मौजूद नहीं है। डॉक्टर सिर्फ लक्षणों का इलाज करते हैं और मरीज की इम्युनिटी पर भरोसा करते हैं।
यह वायरस हमें याद दिलाता है कि हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां जानवरों के वायरस कभी भी इंसानी आबादी में कूद सकते हैं। बचाव का सिर्फ एक ही मंत्र है—सतर्कता। चाहे वह खजूर का रस उबाल कर पीना हो, या फलों को अच्छे से धोकर खाना, या फिर संदिग्ध मरीज से दूरी बनाना।
निपाह सोता है, मरता नहीं। इसलिए सावधानी ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है।
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