इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर अमेरिका के दौरे पर हैं। इस बार उनका मिशन बेहद खास और चुनौतीपूर्ण है। बुधवार को वे व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात करेंगे। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच ओमान में ‘सकारात्मक’ बातचीत शुरू हो चुकी है, जिससे इजरायल की चिंताएं बढ़ गई हैं।
दरअसल, राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में संकेत दिए थे कि वे ईरान के साथ केवल परमाणु हथियारों को रोकने के लिए समझौता कर सकते हैं। लेकिन नेतन्याहू का मानना है कि यह इजरायल के लिए पर्याप्त नहीं है। इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय ने साफ कर दिया है कि किसी भी समझौते में ईरान के ‘बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम’ और उसके ‘आतंकवादी नेटवर्क’ पर पाबंदी लगाना अनिवार्य होना चाहिए।
पिछले साल जून में इजरायल और ईरान के बीच हुए 12 दिनों के युद्ध की यादें अभी भी ताजा हैं। उस समय इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था, लेकिन ईरान की मिसाइल शक्ति अभी भी एक बड़ा खतरा बनी हुई है। नेतन्याहू इसी खतरे को ट्रंप के सामने प्रमुखता से रखेंगे। वे चाहते हैं कि अमेरिका ईरान पर ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (अधिकतम दबाव) की नीति जारी रखे और उसे किसी भी तरह की ढील न दे।
जानकारों का कहना है कि नेतन्याहू इस यात्रा के जरिए ट्रंप प्रशासन को इजरायल की ‘रेड लाइन्स’ यानी लक्ष्मण रेखाओं के बारे में याद दिलाना चाहते हैं। इजरायल को डर है कि अगर अमेरिका ने सिर्फ परमाणु मुद्दे पर समझौता किया, तो ईरान को मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल हिजबुल्लाह और हमास जैसे संगठन इजरायल के खिलाफ करेंगे।
इस मुलाकात का असर न केवल इजरायल और अमेरिका के रिश्तों पर पड़ेगा, बल्कि यह पूरे मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) की राजनीति की दिशा तय करेगा। क्या ट्रंप अपने ‘दोस्त’ नेतन्याहू की बात मानकर ईरान पर शर्तें बढ़ाएंगे, या वे अपनी ‘डील मेकर’ की छवि को प्राथमिकता देंगे? दुनिया की नजरें अब बुधवार को होने वाली इस ‘पावर मीटिंग’ पर टिकी हैं।
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