कोलकाता, 10 जनवरी, 2026 – पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। 8 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (I-PAC) से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की। I-PAC वही संस्था है जिसने 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कैंपेन की कमान संभाली थी।
ममता बनर्जी का तीखा हमला छापेमारी के दौरान खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी I-PAC के दफ्तर पहुंचीं और केंद्र की भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने इसे “लोकतंत्र पर हमला” बताते हुए कहा कि ED का इस्तेमाल चुनाव से पहले हमारी आंतरिक रणनीति और डिजिटल डेटा को जब्त करने के लिए किया जा रहा है। ममता ने सवाल उठाया कि क्या ये एजेंसियां कभी भाजपा या उसके सहयोगियों के खिलाफ भी इतनी ही सक्रियता दिखाती हैं?

ED का पक्ष और कानूनी लड़ाई दूसरी ओर, ED का दावा है कि यह छापेमारी मनी लॉन्ड्रिंग की एक पुरानी जांच का हिस्सा है और इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। एजेंसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख करते हुए आरोप लगाया है कि छापेमारी के दौरान TMC समर्थकों ने अधिकारियों का रास्ता रोका और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को वहां से हटा दिया गया।
संस्थानों की साख पर सवाल यह पहली बार नहीं है जब विपक्षी दलों ने ED, CBI और IT विभाग की टाइमिंग पर सवाल उठाए हैं। 2024 के आम चुनाव के दौरान कांग्रेस के बैंक खाते फ्रीज किए जाने का उदाहरण देते हुए विश्लेषक कह रहे हैं कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल अब राजनीतिक विरोधियों को कोने में धकेलने के लिए किया जा रहा है।
बंगाल की इस लड़ाई में जीत चाहे जिसकी भी हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी संस्थानों की निष्पक्षता पर उठ रहे ये सवाल भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय हैं।
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