दुनिया बदल रही है, और इस बदलती दुनिया में पुराने दोस्त भी अब शर्तों पर बात करने लगे हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने शुक्रवार को जो बयान दिया, उसने पूरे यूरोप की नींद उड़ा दी है। मर्ज ने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में “मरम्मत” (Repair) की जरूरत है।
आसान भाषा में समझें तो, जर्मनी ने मान लिया है कि अमेरिका अब यूरोप का ‘बड़ा भाई’ बनकर मुफ्त में उसकी सुरक्षा नहीं करेगा।
‘मुफ्त की सुरक्षा’ का दौर खत्म सालों से यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहा है। नाटो (NATO) का खर्च हो या फौज, सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका देता आया है। लेकिन अब वॉशिंगटन का मूड बदल चुका है। 2026 में अमेरिका अपनी घरेलू दिक्कतों और चीन की चुनौती में उलझा है। ऐसे में चांसलर मर्ज ने यूरोप के नेताओं को कड़वा सच बताया है।
उन्होंने कहा, “हमें इन रिश्तों को फिर से जिंदा करना होगा। अमेरिका हमारा साथ तभी देगा जब हम अपनी मदद खुद करेंगे।” इसका मतलब साफ है—जर्मनी और बाकी यूरोपीय देशों को अपनी सेना और हथियारों पर अब मोटा पैसा खर्च करना होगा। वे अब अमेरिका के भरोसे हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते।
व्यापार पर भी तनातनी सिर्फ फौज ही नहीं, झगड़ा धंधे का भी है। पिछले कुछ समय से अमेरिका और यूरोप के बीच ‘ट्रेड वॉर’ जैसी स्थिति बनी हुई है। अमेरिका अपनी कंपनियों को बचाने के लिए कड़े नियम बना रहा है, जिससे जर्मन और यूरोपीय कंपनियों को नुकसान हो रहा है।
मर्ज ने अपने भाषण में इसी बात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अगर पश्चिम (West) के देश आपस में ही लड़ते रहे, तो इसका सीधा फायदा चीन और रूस जैसे देशों को मिलेगा। उन्होंने एक नए ‘आर्थिक समझौते’ की वकालत की है ताकि दोनों तरफ के बाजार खुले रहें।
मर्ज का नया जर्मनी फ्रेडरिक मर्ज का यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि वे ओलाफ शोल्त्स के बाद जर्मनी की कमान संभाल रहे हैं और उनकी छवि एक सख्त नेता की है। वे जानते हैं कि अगर यूरोप कमजोर पड़ा, तो रूस का खतरा बढ़ जाएगा। इसलिए वे अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाने के बजाय एक ‘मजबूत पार्टनर’ बनकर खड़ा होना चाहते हैं।
कुल मिलाकर, जर्मनी ने यूरोप को चेतावनी दे दी है—या तो अपनी ताकत बढ़ाओ और अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलो, या फिर अकेले रहने के लिए तैयार हो जाओ। 2026 की जिओ-पॉलिटिक्स में कमजोरों के लिए कोई जगह नहीं बची है।
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